Wednesday, April 13, 2022

श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन


श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन
हरण भव भय दारुणं।
नवकंज-लोचन कंज मुख,
कर कंज, पद कंजारुणं॥१॥

कन्दर्प अगणित अमित छवि
नवनील-नीरद सुन्दरं।
पटपीत मानहु तड़ित रुचि
शुचि नौमि जनक सुतावरं॥२॥

भजु दीनबन्धु दिनेश
दानव दैत्यवंश-निकन्दनं।
रघुनन्द आनन्द कंद
कौशलचन्द दशरथ-नन्दनं॥३॥



सिर मुकट कुण्डल तिलक
चारु उदारु अंग विभूषणं।
आजानु-भुज-शर-चाप-धर,
संग्राम जित-खरदूषणं॥४॥

इति वदति तुलसीदास
शंकर-शेष-मुनि-मन-रंजनं।
मम हृदय-कंज निवास कुरु,
कामादि खलदल-गंजनं॥५॥

मनु जाहिं राचेउ मिलिहि
सो बरु सहज सुंदर सांवरो।
करुणा निधान सुजान
सील सनेह जानत रावरो॥६॥

एहि भांति गौरि असीस सुनि
सिय सहित हियं हरषी अली।
तुलसी भवानिहि पूजि पुनि-पुनि
मुदित मन मंदिर चली॥७॥

जानि गौरी अनुकूल सिय
हिय हरषु न जाइ कहि।
मंजुल मंगल मूल
वाम अंग फरकन लगे॥८॥

No comments:

Post a Comment

Please Leave me feed Back here as comments . Thank you .